
मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा में घटित हृदयविदारक घटना, जहाँ ज़हरीले कफ सिरप ने कई मासूमों की जान ले ली, केवल एक स्थानीय आपदा नहीं है।बल्कि यह हमारे देश की स्वास्थ्य सुरक्षा प्रणाली और औषधि गुणवत्ता नियंत्रण पर एक गहरा दाग है। “दवा में जहर” स्वयं में एक भयावह विरोधाभास है। दवा, जो जीवन बचाने और स्वास्थ्य बहाल करने का प्रतीक है, जब स्वयं घातक विष बन जाती है, तो यह जनता के उस मूलभूत विश्वास को तोड़ देती है जो चिकित्सा विज्ञान और फार्मास्युटिकल उद्योग पर टिका होता है।
कैसे विश्वासघात बन गया यह कड़वा सच
दवा में जहर का मिलना कोई दुर्घटना नहीं, बल्कि एक जानलेवा अपराध है जो घोर लापरवाही और अनैतिक व्यापारिक लाभ के लालच से उपजा है। छिंदवाड़ा मामले में, बच्चों की मौत का कारण बना ‘कोल्ड्रिफ’ नामक कफ सिरप, जिसमें अत्यधिक मात्रा में डायएथिलीन ग्लाइकॉल (DEG) नामक औद्योगिक रसायन पाया गया। डीईजी एक सस्ता, मीठा लगने वाला सॉल्वेंट है जिसका उपयोग आमतौर पर सिरप को गाढ़ा करने के लिए इस्तेमाल होने वाले प्रोपलीन ग्लाइकॉल (Propylene Glycol) के स्थान पर, मुनाफा कमाने के लिए, अवैध रूप से किया जाता है। इसकी उपस्थिति सीधे तौर पर दवा निर्माता कंपनी की आपराधिक मंशा या अक्षम्य लापरवाही को दर्शाती है। यह जानते हुए कि यह रसायन गुर्दे की विफलता और मृत्यु का कारण बनता है, इसे बच्चों की दवा में मिलाना मानव जीवन के साथ खिलवाड़ है।
नियामक शिथिलता :
दवा में जहर तब घुसता है जब दवा नियंत्रक तंत्र (Drug Control Mechanism) या तो कमजोर होता है या भ्रष्ट। ज़हरीला सिरप बाज़ार तक पहुँच गया और बच्चों को दिया गया, इससे स्पष्ट होता है कि उत्पादन के चरण में गुणवत्ता नियंत्रण जांचें विफल रहीं और बाज़ार में वितरण के बाद निगरानी नदारद थी। देश भर में नकली या घटिया दवाओं के बेरोकटोक चलन के पीछे नियामक संस्थाओं की यही शिथिलता मुख्य कारण है।
स्वास्थ्य सुरक्षा पर संकट :
“दवा में जहर” की यह घटना केवल छिंदवाड़ा तक सीमित नहीं है। विश्व स्तर पर और भारत में भी, डीईजी युक्त सिरप से होने वाली मौतों की पिछली घटनाएं दर्ज हैं। यह प्रवृत्ति देश की जन स्वास्थ्य सुरक्षा पर एक बड़ा संकट पैदा करती है।
चिकित्सा पर अविश्वास
इस तरह की त्रासदियां जनता के मन में डॉक्टरों, अस्पतालों और सबसे बढ़कर दवाओं के प्रति अविश्वास पैदा करती हैं। गरीब और ग्रामीण परिवारों के लिए, जिसने अपना सब कुछ बेचकर बच्चे का इलाज कराया, यह अनुभव उनके विश्वास को हमेशा के लिए तोड़ देता है।
आगे का रास्ता: सबक और सुधार
छिंदवाड़ा की त्रासदी “दवा में जहर” के गंभीर खतरे के खिलाफ एक कठोर सबक है। इस तरह के विश्वासघात को रोकने के लिए व्यापक और तत्काल सुधारों की आवश्यकता है। दवा में मिलावट करने वाले और लापरवाही बरतने वाले निर्माताओं, वितरकों के खिलाफ गैर-जमानती धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज होना चाहिए। इन अपराधों को हत्या की श्रेणी में रखा जाना चाहिए। केंद्रीय और राज्य स्तर पर औषधि परीक्षण प्रयोगशालाओं को आधुनिक तकनीक और विशेषज्ञ कर्मचारियों से सुसज्जित किया जाना चाहिए। दवाओं की बैच-दर-बैच रैंडम जांच अनिवार्य हो।
आधुनिक और उन्नत चिकित्सा विज्ञान या लाभ और लालच का मकड़जाल?
“दवा में जहर” केवल एक उत्पाद की विफलता नहीं है, बल्कि एक पूरे सिस्टम की विफलता है। जब तक सरकार और नियामक निकाय स्वास्थ्य को एक पवित्र जिम्मेदारी नहीं मानेंगे और व्यापारिक लालच पर सख्त नियंत्रण नहीं रखेंगे, तब तक हर दवा की शीशी के पीछे ज़हर का खतरा मंडराता रहेगा। छिंदवाड़ा के बच्चों की मौतें हमें याद दिलाती हैं कि स्वास्थ्य सुरक्षा कोई विकल्प नहीं, बल्कि एक मौलिक अधिकार है जिसके साथ कोई समझौता नहीं किया जा सकता। इस तरह की घटनाओं से बचने के लिए कई उपाय हो सकते है। स्वास्थ्य और औषधियों के संबंध में गंभीरता और सतर्कता के लिए सरकार की गाइड लाइन, नियम कानून में किसी चूक के चलते इस तरह की घटनाएं नहीं होती बल्कि जब व्यापारिक लाभ और भ्रष्ट प्रशासनिक तंत्र अपने थोड़े से लालच की पूर्ति के लिए अधिक लापरवाह हो जाता है तो उसकी कीमत बेकसूर लोगों को अपनी जान देकर चुकानी पड़ती है, तब सरकार की भी आंखे खुलती है और कुछ संवेदनशीलता से भरे निर्देश, सख्ती, कार्यवाही के बाद फिर बंद हो जाती है अगली किसी घटना तक के लिए। इस तरह की घटनाओं के पीछे होने वाले लालच और भ्रष्टाचार की सीमा कम होने पर कुछ खास असर भले न दिखता हो पर तब भी दवाओं के उत्पादन में इस तरह की छोटी लापरवाहियों से पता नहीं कितने मरीज अन्य बीमारियों का शिकार हो जाते होगे! पर इनका खुलासा नहीं हो पाता। लोग इन गुणवत्ताहीन दवाओं के चंगुल में जकड़ते जा रहे है। देश दुनिया ने चिकित्सा विज्ञान में जितनी ज्यादा प्रगति की है स्वास्थ्य सुविधाएं जितनी आधुनिक हुई है, उतनी ही तेजी से बड़े छोटे अस्पतालों की संख्या बढ़ी है और उनमें आने वाले मरीजों की संख्या दिनों दिन बढ़ रही है। 20 साल पहले जिन गांवों से 50 किमी दूर दवा दुकान और अस्पताल होते थे आज ऐसे छोटे गांवों में भी अस्पताल और दवा की दुकानें है, जिनमें अच्छा खासा कारोबार भी होता है। चिकित्सा विज्ञान में हुई इस तरक्की के बाद ही समाज की स्वास्थ्य बीमा और रूटीन चेकअप जैसी व्यवस्थाओं को अपनाना पड़ रहा है। स्वास्थ की जांच के लिए मल्टीनेशनल कम्पनियां आ रही है। इसके पीछे की सही वजह पर मनन करने की जरूरत है कि क्या वास्तव में बीमारियों का प्रकोप बढ़ गया है या फिर उन्नत चिकित्सा कारोबारियों ने मानव शरीर का अधिक विश्लेषण कर के स्वास्थ्य के प्रति भय पैदा करने का काम ज्यादा दिया।
आज देश में स्वास्थ्य संबंधी कारोबार उद्योग बन चुका है। इसे हेल्थ प्रोफेशन नहीं हेल्थ इंडस्ट्री कहा जाता है। इस क्षेत्र में दवा की साधारण दुकान से लेकर, बड़े अस्पताल, परीक्षण प्रयोगशालाओं से लेकर दवा निर्माता तक पूरा कारोबार अच्छे मुनाफे का कारोबार कहलाता है। स्वास्थ के क्षेत्र में इसी मोटे मुनाफे की सोच ने इतने पैर पसार लिए है कि अब दवा में जहर की मात्रा अधिक करने से भी परहेज नहीं किया जा रहा है। तब भी सरकार इसको लेकर बहुत गंभीर नहीं है। डॉक्टर पर FIR कर उसे जेल भेज दिया? उसने दवा लिखी थी जो मानक के अनुरूप है या नहीं उसे कैसे पता चलता? निर्माता कंपनी दवा में जहर मिला दे तो डाक्टर कैसे दोषी हो गया? जाहिर तौर पर जिसने जहर मिलाया और सरकार की तरफ से जिन्हें इसकी निगरानी के लिए नियुक्त किया गया है उन्हें सूली पर चढ़ाया जाना चाहिए़ बेकसूरों को मौत के मुंह में झोंकने के लिए। आज के इस आपराधिक दौर में हमारा शरीर तभी तक सुरक्षित है जब तक हम दवा और उसके जहर के मकड़जाल से बचे रहे। इक बार हम “हेल्थ कोर्सेस” इंडस्ट्री के चंगुल में आ गए तो फिर निकलना नामुमकिन है, क्योंकि हमें बचाने वाला कोई नहीं है, जिम्मेदार सरकार की आंखे दुर्घटना के समय भर खुलती है बस। हमें यह जान लेना चाहिए कि अब दवा में जहर: विश्वासघात की एक कड़वी घूँट” है जो कभी भी किसी को मौत के मुंह में ढकेल सकती है।


