बैगांचल एक्सप्रेस, डिंडोरी, 15 सितंबर 2025, पंचायती राज अंतर्गत ग्राम पंचायतों के माध्यम से आमलोगों के लिए बहुत सारी योजनाओं का संचालन करने के पीछे सरकार की मंशा यह ही है कि हर क्षेत्र और हर ग्राम का सामान विकास हो। पिछड़े से पिछड़े इलाके के गांवों तक शासन की हर योजना का लाभ पहुंच सके जिसके लिए स्थानीय लोगों द्वारा चुने गए जनप्रतिनिधियों के द्वारा ग्राम पंचायत के माध्यम से विकास कार्यों और शासन की योजनाओं का क्रियान्वयन किया जाए। किंतु वास्तव में ग्राम पंचायतों में व्याप्त भ्रष्टाचार और भेदभाव रवैए के चलते आम ग्रामीणों को शासन की मंशानुसार लाभ नहीं मिल पा रहा है। अधिकतर ग्राम पंचायतें भ्रष्टाचार का शिकार है, हकीकत तो यह है कि जनप्रतिनिधियों को ही शासन से प्राप्त होने वाली निधियों के आय और व्यय की जानकारी नहीं होती। पंचायत सचिव, मनरेगा सहायक आदि मिलकर मनमानी पूर्वक शासन की राशि को निपटा रहे है। और उनके कारनामों का परिणाम झेलना पड़ता है भोले भाले और कम शिक्षित जनप्रतिनिधियों को। इसी के चलते अधिकतर पंच और सरपंच ग्रामवासियों के गुस्से का शिकार होते है और दोबारा चुनाव नहीं जीत पाते। ग्रामीणों को मजदूरी नहीं मिलना, लोगों को आसानी से योजनाओं का लाभ नहीं मिलना, विकास कार्यों का नहीं होना आमबात है। वही जिले भर में पंचायतों द्वारा किए जा रहे भ्रष्टाचार की शिकायतें देखने और सुनने मिलती है। ग्राम पंचायतों द्वारा सरकारी धन को हड़पने के कई फंडे बना रखे है जिससे वे आसानी से सरकारी खजाने में सेंध लगा रहे है
कम्प्यूटर और ऑनलाइन सेंटर्स के नाम पर मनमानी सामग्रियों के भुगतान
ऐसा ही कुछ देखने मिलता है ग्राम पंचायतों द्वारा कंप्यूटर कार्य और ऑनलाइन सेंटर्स के बिलों के भुगतान के मामले में। ज्यादातर ग्राम पंचायतों में ऐसे कंप्यूटर और ऑनलाइन सेंटर्स के नाम पर हर माह नियमित तौर पर बिलों का भुगतान किया जाता है जिनका बाजार में अस्तित्व ही नहीं है। अधिकतर पंचायतों में हर माह कम से कम अनुमानित 10 से 15 हजार रुपयों और अधिकतम की कोई सीमा नहीं के बिलों का भुगतान किया जाता है। जिनमें फोटो कॉपी, कम्प्यूटर कार्य, डिवाइस, नेट पैक आदि के खरीदे जाने के नाम पर भुगतान हो रहा है। किसी गांव, गली, मोहल्ले के पते, इन बिलों पर अंकित होते है वहां खोजने पर भी इनका पता नहीं चलता पर ग्राम पंचायत के द्वारा किए जा रहे भुगतान को और इन फर्मों को देखकर तो यही लगता है कि ये स्थापित कारोबारी है। ऐसी बोगस दुकानें लगभग हर पंचायत में चल रही है जिनके बिल एक दो ग्राम पंचायतों में दिखाई देते है। मजे की बात तो यह है किसी किसी पंचायत में तो इन सेंटरों के नाम पर लगे बिलों में स्टेशनरी, लोहा, सीमेंट, गिट्टी, रेत से लेकर चाय नाश्ता और टैक्सी आदि के भुगतान भी किए जा रहे है। किंतु ऑनलाइन पोर्टल पर दिखाई दे रहे इन बिलों पर जनपद पंचायतों द्वारा कोई आपत्ति दर्ज की जा रही है और न ही ग्राम पंचायतों के आडिट में इन पर कोई सवाल उठ रहे है। इस तरह से जिले भर में इस तरह की बोगस संस्थाओं के नाम पर प्रतिवर्ष कई करोड़ रुपयों के भुगतान हो रहे है। ऐसी कई संदिग्ध फर्मों की तलाश हमारे द्वारा की गई जिनका बिलों में अंकित पते ठिकाने पर अस्तित्व ही नहीं है पर इनके नाम पर ग्राम पंचायतों द्वारा कई लाख रुपयों के भुगतान किए जा चुके है। जिला और जनपद पंचायतों को ऐसी बोगस संस्थाओं की जांच कराकर जिले भर में इनके नाम पर चल रहे कई करोड़ रुपयों के गोरख धंधे की रोकथाम के लिए कड़ी कार्यवाही की जानी चाहिए। विकास खंड और जिला मुख्यालय में इस तरह की कुछ ऐसी फर्में भी है जिनके नाम पर लाखों लाख रुपए के भुगतान हर वर्ष हो रहे है तब भी वे पंचायत विभाग के अधिकारियों की आंखों में नहीं खटक रहे है। विभाग की छूट का नतीजा ही है कि अब इस तरह की बोगस फर्में हर पंचायत में दिखाई देने लगी है जिनके नाम पर ग्राम पंचायतें हर वर्ष कई लाख रुपए का खेल खेल रही है।

