वन विभाग की सीमा में शामिल हुई वर्षों से बैगा जनजाति की काबिज भूमि- ग्रामीणों ने की पुनः सर्वे कर सुधार की मांग

ग्रामीणों की मांग राजस्व और वन विभाग की सयुक्त टीम से पुनः सर्वेक्षण कराया जावे

बैगांचल एक्प्रेस, डिंडोरी, विकासखंड करंजिया अंतर्गत ग्राम चकरार निवासी बैगा जनजाति के ग्रामीण वन विभाग के सर्वे के उपरांत उनकी जमीनें वन विभाग की सीमा में चले जाने से परेशान है। उनका कहना है कि जो भूमि कई पुश्तो से उनके परिवार के कब्जे में थी और कई पीढ़ियों का भरण पोषण जिस भूमि से होता आया है, वन ग्राम और राजस्व ग्राम परिवर्तन की प्रक्रिया के बाद वन विभाग अब उन भूमियों पर अपना कब्जा बता रहा है। इस सरकारी प्रक्रिया के बाद जनजाति लोगों की पुस्तैनी जमीनें उनसे छीनती दिखाई दे रही है जिससे ग्रामीण अत्यधिक चिंतित है इस प्रक्रिया से इन भोले भाले लोगों के भविष्य पर खतरा मंडरा रहा है।

पीड़ित परिवारों ने लगाई न्याय की गुहार

इस समस्या से गुजर रहे पीड़ित ग्रामीणों के अनुसार वन ग्राम चकरार ग्राम पंचायत ठाढ़पथरा विकासखंड करंजिया अग्रेजों के शासन काल से बसा हुआ है। जहां हम सभी के बुजुर्ग बसे हुए थे और उसके बाद की पीढ़ियां भी अब तक इस गांव में रह रही है। यहां की बैगा जनजाति आबादी के 52 गांवों को बैगाचक चांड़ा नाम दिया था, उस समय से गांव बसा हुआ है। अंग्रेज द्वारा 1922 में वन विभाग की गठन कर 1927 में कानून बनाकर, गांवों में आबादी सर्वेक्षण एवं जंगल सर्वेक्षण विभाग एवं गांव के सियानों के साथ मिलकर किया गया था। सर्वे के दौरान हर 200 मीटर में मुनारा के नाम से पत्थरों को लगवाया गया था। इसके बाद जंगल की सीमा एवं कास्तकारी करने हेतू अलग अलग सीमा की पहचान रखी गई थी। उसी सीमा रहकर वर्षों से हमारे पूर्वज खेती किसानी कर अपने परिवार का पालन पोषण करते आ रहे हैं। जो कि वन अधिकार अधिनियम 2006 -07 के संशोधन नियम, 2012 के तहत राजस्व ग्राम हेतू संपरिवर्तन की कार्यवाही के दौरान काबिज जमीन वन विभाग के नक्शों में मैच नही हो रही है। जो भूमि सर्वेक्षण कार्य में हमारे पूर्वजो की जमीनें ,जंगल में जा रही है, जबकि 2006 के कानून के तहत 13 दिसम्बर 2005 के पूर्व काबिज लोगों को जमीन का पट्टा देने का प्रावधान है किंतु वन विभाग द्वारा पिछले कुछ महीनों से जो नया सर्वेक्षण किया गया है उससे जमीनों में बहुत अधिक उलटफेर होने से वनग्राम के निवासी जनजाति लोगों की अधिकांश जमीनें उनके अधिकार से वन विभाग के कब्जे में जा रही है। जिससे हम परिवार के सामने भविष्य को लेकर संकट मंडराता दिखाई दे रहा है जिसका जनजाति परिवारों के होते न्यायसंगत समाधान किया जाना बेहद जरूरी है।

बैगाचक क्षेत्र अंतर्गत चाड़ा के करीबी ग्राम चकरार में वन विभाग के द्वारा किए जा रहे भूमि के नाप जोख में गांव के जनजाति लोगों भूमि बड़ी मात्रा में फॉरेस्ट के कब्जे में चली गई है । शासन के निर्देश अनुसार वनग्रामों को राजस्व ग्रामों में परिवर्तित करने की इस प्रक्रिया में कई पीढियों से उस भूमि पर मकान बनाकर कृषि कार्य करते हुए जीवन यापन करने वाले आदिवासी परिवारों के सामने संकट खड़ा हो गया है। यहां के निवासी विकाखंड से लेकर जिला स्तर तक अपनी समस्या रखकर न्यायसंगत निराकरण का प्रयास कर रहे है।

इसी क्रम में पीड़ित जनजाति महिला और पुरुष बड़ी संख्या में 2 दिसंबर को जनसुनवाई में पहुंचे। तहसीलदार आर पी मार्को को आवेदन देते हुए उन्होंने अपनी मांग रखी कि उन्हें जिस भूमि पर वह वर्षों से काबिज हैं वापस दिलाई जाए। ग्रामीणों ने अपने आवेदन पत्र में लिखा है कि जिस भूमि पर उनका कब्जा है सरकार द्वारा वन अधिकार पत्र भी उन्हें दिया गया है । अब वन विभाग सर्वे कर अपनी सीमाओं का सीमांकन करने की प्रक्रिया पिछले दिनों से कर रहा है जिसमें लोगों को उनकी ही भूमि से बेदखल कर दिया है।

ग्रामीणों की पुनः सर्वेक्षण कराने की मांग

अब ग्रामीणों की मांग है कि वन विभाग और राजस्व विभाग की सयुक्त टीम गठित की जावे और पुनः सर्वेक्षण का कार्य कराया जाए और उनकी भूमि का नक्शा सुधार कर उसे राजस्व के रिकॉर्ड में दर्ज कराया जाए। इसके साथ ही काबिज भूमि का पट्टा भी उन्हें प्रदान किया जाए। चकरार ग्राम से बड़ी संख्या में महिला और पुरुष जिला मुख्यालय कलेक्टर के पास आवेदन देने पहुंचे थे।

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