झिरिया का पानी पीने मजबूर 75 घर के बैगा आदिवासी परिवार

सेंदुरखार और खराईलटोला में ना हेंडपंप ना नल जल योजना

मूलभूत सुविधाओं के आभाव में जीवन जी रहे आदिवासी बैगा बाहुल्य क्षेत्र में अधिकतर ग्रामीण क्षेत्रों में बैगा आदिवासी परिवार को आज भी शुद्ध पेयजल नहीं मिल पा रहा है। जिसके चलते आदिवासी परिवार जंगलों के बीच एक झिरिया का पानी पीने को मजबूर है जहां चारों ओर बेसरम की झाड़ियां और गाजर घास की खरपतवार उग आई है।

हम बात कर रहे हैं खनिज संपदा का भंडार संजोए जनपद पंचायत पिपरिया के पोषक ग्राम सेंदुरखार और खराईलटोला की जहां लोग झिरिया का पानी पीने को मजबूर है। सेंदुरखार में लगभग 40-50 घर के बैगा आदिवासी परिवार है जिनकी आबादी लगभग 250 है, जबकि खराईनटोला में 30-35 परिवार है जहां 200 के आसपास लोग रहते हैं। जबकि वहां एक भी हेडपंप नहीं है और महत्वपूर्ण यह है कि प्रशासन ने नल जल योजना और कोई ऐसी योजना नहीं बनाई गई और ग्रामीणों को उसी हालत पर जीने के लिए छोड़ दिया गया है जिससे क्षेत्र के ग्रामीणों को शुद्ध पेयजल नहीं मिल पा रहा है, और भविष्य में शुद्ध पेयजल आपूर्ति के लिए कोई योजना नहीं बनाई गई है। विकास की पीठ थपथपाने वाले प्रशासन के मुंह पर तमाचा है जो कि आजादी के सत्तर साल बाद भी लोग असुरक्षित और खरपतवार के बीच झिरिया का पानी पीने को मजबूर है। जिसका खामियाजा उन्हें बरसात के मौसम में होने वाली बीमारियों से गुजरना पड़ रहा है। सूत्र बताते हैं कि ग्राम सेंदुरखार में अशुद्ध पानी के चलते अनेक परिवार में उल्टी-दस्त और बुखार की बीमारी फैल गई है जिसमें स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही भी सामने आ रही है जिसके चलते गांव में झोलाछाप डॉक्टरों की चांदी हो गई है और लोग मेहनत की कमाई को इलाज में खर्च करने मजबूर है। प्रशासन विकास के लाख दाबे करे पर क्षेत्र में अनेक बैगा आदिवासी को शुद्ध पेयजल तक मुहैया ना करा पानी धरातल पर शासन के लोक लुभावन वादे की पोल खोल देता है।

इनका कहना है

हम रोज इसी झिरिया का पानी पीते हैं, जिससे बीमार भी हो जाते हैं पर गांव में एक भी हेंड पंप नहीं है- किसानिन बाई, ग्रामीण

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